शुक्रवार, 17 सितंबर 2021
स्पर्श चिकित्साः हर माता पिता हैं अपने बच्चों के डाक्टर
ये किसी गंभीर बीमारी की बात नहीं है। किसी गंभीर स्थिति में तो डॉक्टर के पास जाना ही उचित है लेकिन अक्सर होता ये है कि बच्चे की थोड़ी बहुत तबियत खराब होने पर भी माता पिता घबड़ा जाते हैं। अपने बच्चों से अत्यधिक मोह के चलते उन्हें हमेशा एक अंजाना भय सताता रहता है। इसके लिए कई बार वह नजर झड़वाने के लिए तो कभी स्वाभाविक स्वभाव को लेकर कि बच्चा जैसे जैसे बड़ा हो रहा जिद्दी होता जा रहा है। शरारती हो रहा है। कुछ दे दीजिए कुछ कर दीजिए। इस तरह की बातें अक्सर होती रहती हैं।
वस्तुतः हम अपनी सकारात्मक ऊर्जा से अंजान रहते हैं। या उसके इस्तेमाल करने का तरीका नही जानते है। होता ये है कि मोह और प्रेम में अंधे होकर हम ये भूल जाते हैं कि उन्हें जन्म हमने दिया है। उनके भगवान हम हैं। फिर हम उनके लिए दूसरों के आगे क्यों गिड़गिड़ाएं।
इसके कई कारण हैं पहला ये कि बच्चा माता पिता का अंश होता है। बच्चे के चोट लगती है तो मां का स्पर्श उसे इतना स्फूर्त कर देता है कि वह कुछ क्षण में फिर से खेलना शुरू कर देता है। इसके अलावा किसी खतरे के आसन्न होने पर पिता की गोद उसे सबसे सुरक्षित लगती है। और होती भी है। ये सहज घटनाएं याद रखनी चाहिए। आपका आत्मबल इतना होना चाहिए कि आपके बच्चे को कुछ नहीं हो सकता। एक उदाहरण दे रहा हूं बुरा नहीं मानना चाहिए आप एक कुत्ते के पिल्ले को पालतू बनाकर जितना स्नेह देते हैं क्या आप अपने बच्चे को उतना स्नेह दे पाते हैं। शायद नहीं। इसकी वजह है कुत्ते के पिल्ले को आप जानवर मानकर चलते हैं। और अपने बच्चे की दूसरे के बच्चे से तुलना शुरू कर देते हैं।
एक मासूम बच्चे का अपराध इतना है कि वह इंसान का बच्चा है। इसलिए उससे अपेक्षाएं जुड़ती हैं। फलाने का बच्चा ऐसा है। वो बच्चा पढ़ने में तेज है। हम बच्चे थे तो ऐसे नहीं थे। आप अपने बच्चे को अपनी कुंठाओं के पौधे के रूप मे तैयार न करें। उसको परवरिश अपने स्नेह की छाया में करें। उसका पोषण करें। निसंदेह वह मजबूत और स्वस्थ मानसिकता का होगा।
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